बुधवार, 12 सितंबर 2012


  


भूखे बालक की उंगली
चंद्रमा पे टिकी थी
ले ममता का आँचल
माँ की साँसे रुकी थी
कान्हा की भी उंगली
चाँद पे रुकी थी
बाल हठ के आगे
यशोदा भी झुकी थी
आज का ये कृष्ण
भूख से पीड़ित है
तन नंगा कुपोषित
धूल से धूसरित है
आरजू में उठी उंगली
मैय्या बहुत छोटी है
वो चन्द्रमा नहीं
वो तो मेरी रोटी है
मैय्या ठिठोली न कर
भूख बड़ी आई है
परात में रोटी नहीं
रोटी की परछाई है
माँ की ममता यहाँ
ऐसे गस खाई है
आंसुओं की धार  
कपोलों में छाई  है
बादल में छिपे चाँद
की आँखे भी डबडबाई है
चन्द्रमा  की आंखे
उस माँ पे टिकी थी 
ममता के आगे
जो सरे आम बिकी थी ...
ममता के आगे
जो सरे आम बिकी थी ...

ओ.बी.ओ.चित्र काव्य में प्रकाशित 

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बेहतरीन भावों को अपनी रचना में उकेरा है ,,,बधाई उमाशंकर जी,,,,

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    1. समय की कमी से प्रिय धीरेन्द्र जी
      मै आपका धन्यवाद ज्ञापित नाहीं कर पाया
      आपका हार्दिक आभार

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  2. रोटी रोदन रात रत, रिक्त *रोटका *रोट |
    **राट हुवे सब राड़ सब, खूब छापते नोट |
    खूब छापते नोट, बनी है ***रोटिहा ममता|
    राज काज का खोट, कहीं न मिलती समता |
    छीने पहरेदार, नजर रोटी पर खोटी |
    बेंचे चीज अमोल, कमाती दो ठो रोटी ||


    *बाजार * गेंहूँ का आटा ** श्रेष्ठ
    ***मात्र रोटी पर काम करने वाली

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    1. आदरणीय रविकर जी
      आपने अपनी इस कुंडली से हमें
      वसीभूत कर लिया है
      आपके तराने जो समझ गया वो माला मॉल होगया
      साहित्य साधना है आपकी कुण्डलियाँ
      हार्दिक आभार
      समय अभाव में मुझे विलम्ब हुवा है
      मै क्षमा चाहता हूँ

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  3. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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  4. उमा शंकर जी आपको यहाँ देखकर बहुत ख़ुशी हुई रचना को दुबारा पढने में भी इतना ही आनंद आया आपके ब्लॉग को फोलो करलिया है मेरा ब्लॉग http://hindikavitayenaapkevichaar.blogspot.in par aapka swaagat hai.

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    1. आदरणीया राजेश कुमारी जी
      आपका साहित्य के प्रति एवं हिंदी के प्रति
      अगाध प्रेम देख कर मै आपका आभारी हूँ
      आपका मेरे इस ब्लॉग में आना मुझे
      सुखकर लगा सादर धन्यवाद

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