गुरुवार, 24 मई 2012

उजबक वाणी


उजबक वाणी....
जन सेवा के नाम पर ,वोट मांगने आय

चुनते हि सरकार में ,लूट लूट सब खाय 

मुस्काते  मनमोहने,  सुरसा डालर आज 

मतदाता घायल हुवा,फिर भी करते नाज

त्राहि त्राहि है देश में, कौन यहाँ बदनाम

एक हि  थैली में घुसे, चट्टे बट्टे नाम 

धीमाविष महंगाई का,धीमी हो गई साँस

नेतागण  बेफिकारा, जन गर्दन में फांस 

डालर रुपया लड़रहे, चौसर,बिछी बिसात 

जनता पांडव लुटगई,शकुनी दे रहा मात

माया बन पेट्रोल अब, ठगनी खेले खेल

आमआदमी पिस गया,जीवन ठेलम ठेल 

उनकी कोठी भर गई, भ्रष्ट जीभ से चाट

आमआदमी मर गया,आँगन उलटी खाट
महंगाई मस्त है, आम आदमी पस्त है,
उमाशंकर मिश्रा
  

शनिवार, 19 मई 2012

बस्तर कि व्यथा


बस्तर कि व्यथा
कोई इतिहास के झरोखों से झांके
अंधेरों में भी दिखेंगी
भयातुर मेरी वेदना भरी आँखे
आदिम युग की  समेटे वह तस्वीर
दिखेगी रोती  बिलखती
भूखी अंजान रधिया कि तक़दीर
मै बस्तरिया अबुझमाड़ कि गाथा
वस्त्र विहीन आदिम संस्कृति
ढो रहा अभाव में डूबी नग्न पावनता
आते जाते सैलानियों के कैमरों में
समा जाता हूँ बन के कला
मेरे वक्ष से लटकती माँ
आँखों में सूखे उन आंसुओं कि छाप
मेरा सब कुछ अजगर बन निगल रहा
नक्सली आतंकी सांप
विस्फोंटो में उड़ गया मेरा अभिमन्यु
निगल गया मेरे अर्जुन का गांडीव
हवाओं में गोलोयों कि फुहार
मर रहा है बिसेसर
मर रही है रधिया आज
उजड़ रहा है रोज परिवार
खामोस हैं सब,देश,संसद
मेरी निजता नहीं है ना ताज
(मुंबई के होटल ताज पे आतंकी हमला हुवा था पूरा देश प्रसासन
संसद क्रियाशील हो गए थे आतंकी चाहे बाहर का हो या अंदर का, है तो आतंकी, जिसे देशद्रोही हि माना जाता है मुबई चूँकि संपन्न है होटल ताज एक संपन्न व्यक्तित्व कि धरोहर है क्या इसीलिए तुरंत कार्यवाही कि गई
आज बस्तर कई साल से आतंक से पीड़ित है क्यों  कोई सार्थक पहल अभी तक नहीं हो सकी क्यों क्यों गरीब कि मौत मौत नहीं है .....)

मंगलवार, 8 मई 2012

प्यारी नींद


मुझको प्यारी राज दुलारी नींद लगी है अच्छी
इसके आते हि सो जाती है, भूखी मेरी बच्ची
मै सुबह पथिक बन, चल निकला हूँ चलने
मै ढूंड ढूंड कर अब जाता हूँ ढलने
मै गया कृषक के नग्न नग्न कोठारों पर
ना पाया पिचके पेटों के उभारों को
क्या तुममे से है कोई उसको देखा
जो मेरी जिंदगी की है जीवन रेखा
फिर किसने मेरी बेटी को सिखलाया है
या झूठ स्वतः हि बालक मन में छाया है
किसान अन्न उगाता है
किसान अन्न का दाता है
मै थक कर जीवन की काली रात हूँ अच्छी
क्योंकि इसके आते हि सो जाती है भूखी मेरी बच्ची
फिर सुबह हुई मन कुंठित ले हिचकोले
जब देखा बेटी को मै आँखे खोले
विस्मित नेत्र अवाक हुवे बिन बोले
करुण ह्रदय में भावुक सागर झंझोले
मै गया पुनः खेत खल्हिहानो पर
मै ढूंड रहा था नींद अन्न के दानों पर
सांझ हुई मै लौटा घर की चौखट पर
सोई थी भूखी बिटिया माँ के आँचल पर
तब लगा जागना झूठ, है यथार्थ नींद की सच्ची
चूँकि इसके आते हि, सो जाती है भूखी मेरी बच्ची 
उमाशंकर मिश्रा