मंगलवार, 8 मई 2012

प्यारी नींद


मुझको प्यारी राज दुलारी नींद लगी है अच्छी
इसके आते हि सो जाती है, भूखी मेरी बच्ची
मै सुबह पथिक बन, चल निकला हूँ चलने
मै ढूंड ढूंड कर अब जाता हूँ ढलने
मै गया कृषक के नग्न नग्न कोठारों पर
ना पाया पिचके पेटों के उभारों को
क्या तुममे से है कोई उसको देखा
जो मेरी जिंदगी की है जीवन रेखा
फिर किसने मेरी बेटी को सिखलाया है
या झूठ स्वतः हि बालक मन में छाया है
किसान अन्न उगाता है
किसान अन्न का दाता है
मै थक कर जीवन की काली रात हूँ अच्छी
क्योंकि इसके आते हि सो जाती है भूखी मेरी बच्ची
फिर सुबह हुई मन कुंठित ले हिचकोले
जब देखा बेटी को मै आँखे खोले
विस्मित नेत्र अवाक हुवे बिन बोले
करुण ह्रदय में भावुक सागर झंझोले
मै गया पुनः खेत खल्हिहानो पर
मै ढूंड रहा था नींद अन्न के दानों पर
सांझ हुई मै लौटा घर की चौखट पर
सोई थी भूखी बिटिया माँ के आँचल पर
तब लगा जागना झूठ, है यथार्थ नींद की सच्ची
चूँकि इसके आते हि, सो जाती है भूखी मेरी बच्ची 
उमाशंकर मिश्रा

3 टिप्‍पणियां:

  1. खुशनसीब हो भैया जो नींद को प्यारी कह रहे हो. रचना मन को छू गई, अति सम्वेदनशील है.क्रृपया जरा बड़े साइज में पोस्ट करें ताकि हम जैसे कमजोर आँखों वालों को पढ़ने में आसानी हो.

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  2. सांझ हुई मै लौटा घर की चौखट पर
    सोई थी भूखी बिटिया माँ के आँचल पर
    तब लगा जागना झूठ, है यथार्थ नींद की सच्ची
    चूँकि इसके आते हि, सो जाती है भूखी मेरी बच्ची

    बहुत सुंदर रचना,..अच्छी प्रस्तुति,,,,,,//
    समर्थक बन गया हूँ आप भी बने मुझे खुशी होगी,,,,,,,,,,,,,,

    MY RECENT POST,,,,फुहार....: बदनसीबी,.....

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