शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

गजल



याद आवारा सी जेहन में सफर करती है
आह एहसास को फुरकत की नजर करती है  |1|

अश्क़ आसानी से अक्सर बहा नहीं करते
चोट गहरी है जुंबा दिल पे जहर करती है |2|

ज़िंदगी है कहाँ महफूज़ लड़कियों की यहाँ
रात अंगारों के बिस्तर पे बसर करती है |3|

निराश जिंदगी मुश्किल में सदा रहती है
आस से राह भी  मुश्किल पे जफ़र करती है |4|

मौत से डर गया बुजदिल वो कहाता यारों
जिंदगी मौत के उस पार सफर करती है |5

चाल बहके तो बदनाम चलन है साकी
जाम छलके बिना मदहोश नजर करती है | 6

दूर सौ कोस से उसने जो हमें याद किया
खुजलियाँ पूरे तन बदन पे कहर करती है |7

उमाशंकर मिश्र 
छ.ग.दुर्ग 

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    मकरसंक्रान्ति की शुभकामनाएँ।

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  2. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.
    आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.
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